पूछते हो क्यों पता दिल का हमसे

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यादों कि महफ़िल, दिन-रात सजना,
दर्द के मारों है यह काम पुराना।।

पूछते हो क्यों पता दिल का हमसे ,
भटकते बघरों का क्या है ठिकाना।।

डूबने वालों कि तरफ देखता नहीं कोई,
बस उगते सूरज का है पुजारी सारा ज़माना ।।

थी गलती बस एक इंसान कि , वहाँ ,
पर देखो बैठा सर झुकाए सारा घराना ।।

है जो बना मिट्टी से आदमी
मिट्टी  के बदन पर क्या इतराना ।।

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