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चौरासी नाम से भी जाना जाता है भरमौर

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देवभूमि हिमाचल का जिला चंबा शिवभूमि  कहलाता है इस क्षेत्र में पाए जाने  वाले देवी-देवताओं को हम वर्गों में बांट सकते हैं
पहले वर्ग में ब्रह्मा, विष्णु , शिव,गणेश और वीर हैं,जबकि स्त्री श्रेणी में काली और ब्रह्माणी हैं विष्णु को ठाकुर या लक्ष्मीनारायण जबकि शिव को महादेव, कैलाशवासी ,त्रिलोचन महादेव, चन्द्रशेखर तथा मणिमहेश के नाम से भू जाना जाता है

नाग जाति में केलंग, वासुकी,पढौल, मंदौर,डलनाग व इंद्रु इत्यादि देवता हैं  तो वीर जाति में गुग्गा, पंडलोक,अजियापल,लखदाता, कैलू व नरसिंह हैं इसी तरह स्त्री वर्ग में काली, आदि शक्ति चौंड़, शीतला, बन्नी,कहहौली, बणास्त, जालपा तथा बणखंडी की मान्यता है

तीसरा वर्ग राक्षण श्रेणी का है, जिमें पुरुष वर्ग में जल बताल, चुंघु ,लौकड़ा,लातड़, मतड़ा,रागस  व जट्टीधार तोरल हैं तो नारी श्रेणी में जोगणी, बला और चुड़ैल

चौथे वर्ग में पितृ देवता आते हैं जिनमें औतर मुख्य हैं पांचवां वर्ग नौण देवताओं का है, जिनमें पनिहारों बावडियों इत्यादि के ऊपर या आस-पास बड़ी पत्थर शिलाओं पर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उकेरी रहती हैं इनमें विष्णु भगवान के दस अवतार, नौ ग्रह सूर्य,वरुण,पंज पांडव लव-कुश, राम-लक्ष्मण और सात नदियों के नमूने यहां आम देखे जाते हैं

मणिमहेश चंबा जिला का ऐसा तीर्थ स्थल है जिसकी सदियों से मान्यता है हिमाचल पर्वत की धौलाधार पहाड़ियों पर बुद्धहिल घाटी में 18564 फुट उंचे कैलाश पर्वत की गोद में 13 हज़ार फुट की ऊंचाई पर यह पवित्र स्थल विराजमान है, जिसके दर्शन के लिए हर साल भादो महीने की कृष्णा जन्माष्टमी से राधाष्टमी तक न सिर्फ चंबा जिला बल्कि जम्मू से भद्रवाह , डोडा व किश्तवाड़ आदि क्षेत्रों से श्रद्धालु पैदल यहां पहुंचते हैं भारी संख्या में लोगों की श्रद्धा और विश्वाश को देखते हुए सरकार ने मणिमहेश यात्रा को वर्ष 1983 में राज्य स्तरीय दर्जा प्रदान किया था

मणिमहेश पहुंचने का सबसे आसान रास्ता जिला मुख्यालय चंबा से ही है , चंबा से चलकर बसों व जीपों द्वारा श्रद्धालु भरमौर पहुंचते हैं जिसका दूसरा नाम चौरासी भी है

 

 

 

 

स्रोत:- दिव्य हिमाचल (competition Review)

 

 

 

 

 

 

जिन्दगी कि धुप में यारा, यह ही है सहारा …

जिन्दगी कि धुप में यारा, यह ही है सहारा ...

आसमान के हर पंछी में, भाई-चारा है,
ज़मीन पर, हर बात का बटवारा है…

उसका घर, मेरे घर से है ऊँचा क्यों,
इस बात पर, भाई ने बही को मारा है…

कोई चढ़ता है, तोह उठा लेते है सीढ़ी,
किसी का चढ़ना हमें कब ग़वारा है..

ना पाने कि ख़ुशी है, और ना खोने का ग़म,
कितना खुशनसीब, इस दुनिया में बंजारा है …

किस मोड़ पर आई है जिंदगी कि कस्ती,
डूब रहे है और सामने किनारा है…

फैला है सर पर माँ कि छाव का आँचल,
जिन्दगी कि धुप में यारा, यही है सहारा।